शनिवार, 17 सितंबर 2011

फिर आग का दरिया है और डूब के जाना है !

एक मौसम सी मुहब्बत का 
बस इतना सा फ़साना है !
कागज़ की हवेली है ,
बारिश का ज़माना है !
क्या शर्त-ए- मोहब्बत है  ,
क्या शर्त-ए-ज़माना है 
आवाज़ भी ज़ख़्मी है,
और वो गीत भी गाना है !
उस पार उतरने की
उम्मीद बहुत कम है .
कश्ती  भी पुरानी  है,
तूफ़ान  को  भी आना  है 
समझें या न समझें वो ,
अंदाज़ मोहब्बत के .
एक ख़ास शख्स को 
आँखों से शेर सुनाना  है 
भोली सी अदा कोई 
फिर इश्क की ज़िद पर है 
फिर आग का दरिया है
और डूब के जाना है !      
 

5 टिप्‍पणियां:

  1. ROOP JI
    सुन्दर रचना के लिए बधाई स्वीकारें /
    मेरी १०० वीं पोस्ट पर भी पधारने का
    ---------------------- कष्ट करें और मेरी अब तक की काव्य-यात्रा पर अपनी बेबाक टिप्पणी दें, मैं आभारी हूँगा /

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  2. भावनाओं को बखूबी लिखा है ..मन की कश्मकश को प्रश्न के माध्यम से उकेरा है .. अच्छी प्रस्तुति

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  3. रूपजी,..कशमकश के बीच बहुत सुंदर जज्बाती रचना,बढ़िया पोस्ट,..

    मेरी रचना पढ़ने के लिए काव्यान्जलि मे click करे

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